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नदी / एकांत श्रीवास्तव
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मुझे याद है आज भी
उसके जल का स्वाद
उसका रूप रंग गंध
यह भी कि धूप में
वह नीलम की तरह
झिलमिलाती थी
यह चिडियों के लौटने
और अमरूद के
पकने का मौसम है
उसे मेरा इंतजार होगा
उसके सीने में पड़े होंगे
आज भी मेरे पत्थर
उसकी लहरों में कहीं होंगे
हमारे बचपन के फूल
आज भी उसके तट पर
सूख रही होगी पिता की कमीज
उसके जल को
छू रही होगी मां की आवाज
और उसके दर्पण में
थरथरा रहा होगा हमारा घर.

