भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
रूपे-रूपे कुरूपे गुरुदेव, बाघनी भोले-भोले / गोरखनाथ
Kavita Kosh से
अनिल जनविजय (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 11:24, 2 मई 2011 का अवतरण (नया पृष्ठ: {{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=गोरखनाथ |संग्रह= }} {{KKCatKavita}} <poem> रूपे-रूपे कुरूपे गु…)
रूपे-रूपे कुरूपे गुरुदेव, बाघनी भोले-भोले ।
जिन जननी संसार दिषाया, ताको ले सूते षोले ।
गुरु षोजो गुरुदेव, गुरु षोजो ब्द्न्त गोरख ऐसा ।
मुषते होई तुम्हें बंधनि पड़िया ये जोग है कैसा ।
चाम ही चाम धसंता गुरुदेव दिन-दिन छीजै काया ।
होट कंठ तालुका सोषी काढी मिजालू षाया ।
दीपक जोति पतंग गुरुदेव ऐसी भग की छाया ।
बूढ़े होइ तुम्हे राज कमाया ना तजी मोह माया ।
ब्द्न्त गोरखनाथ सुनहु मछंदर तुम्हें ईस्वर के पूता ।
ब्रह्म झरनता जे नर राषे सो बोलो अवधूता ।।

