भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

हम रोए तो लगा ज़माना रोता है / अल्पना नारायण

Kavita Kosh से
अनिल जनविजय (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 19:56, 23 सितम्बर 2010 का अवतरण ("हम रोए तो लगा ज़माना रोता है / अल्पना नारायण" सुरक्षित कर दिया ([edit=sysop] (indefinite) [move=sysop] (indefinite)))

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

हम रोए तो लगा ज़माना रोता है
रोज़ यहाँ इक नया फ़साना होता है

कहीं खनकते जाम ख़ुशी के गीत कहीं
कोई भूखे पेट बेचारा सोता है

नहीं वक़्त पर कर पाता जो निर्णय वो
बीच भँवर में फँसकर नाव डुबोता है

दामन अपना खाली देख दुखी मत हो
उतना ही मिलता है जितना बोता है

रिश्ते, नाते, प्यार, वफ़ा सब बेमानी
रिश्ता केवल मजबूरी का होता है