भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
हर बार मांगती है नया चश्म-ए-यार दिल / दाग़ देहलवी
Kavita Kosh से
अनिल जनविजय (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 02:11, 27 सितम्बर 2010 का अवतरण
हर बार मांगती है नया चश्म-ए-यार दिल
इक दिल के किस तरह से बनाऊं हज़ार दिल
पूछा जो उस ने तालिब-ए-रोज़-जज़ा है कौन
निकला मेरी ज़बान से बे-इख्तियार दिल
करते हो अहद-ए-वस्ल तो इतना रहे ख़याल
पैमान से ज्यदा है नापायदार दिल
उस ने कहा है सब्र पड़ेगा रक़ीब का
ले और बेकरार हुआ ऐ बेकरार दिल

