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अन्तर की आवाज़ ने / आत्म-रति तेरे लिये / रामस्वरूप ‘सिन्दूर’

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अन्तर की आवाज़ ने,
साँसों के अन्दाज़ ने,
मुझे बताया है कोई आता होगा!

खोया अपनी चाल में,
उलझा मन के जाल में,
सूरज कभी, कभी शशि बन जाता होगा!

आज लेखनी ‘आँसू’ को लिख कर रह जाती ‘आस’ है,
खुल-खुल जाते हैं वातायन, छू जाता विश्वास है;
आँख अटक जाती जाने क्यों सूने-सूने द्वार में,
डूबा-सा जाता है जीवन बरसाती रसधार में;
छनक-छनक जाती छागल-सी कौन कहे किस ओर से,
रात गए सोया था, लेकिन जाग गया हूँ भोर से;
गति के चंचल पाँव से,
सम्मुख बैठे गाँव से,
आगे-आगे कोई भरमाता होगा!

कल तक जो संस्मरण प्राण में चुभ जाते थे शूल से,
इस मादक-मादक बेला में महक रहे हैं फूल से;
दृष्टि अंक भारती अतीत की एक-एक तस्वीर को,
जाने-अनजाने आ जाती हँसी बिलखती पीर को;
बैरागी सपना घर लौटा, राजकुँवर के वेश में,
सिवा एक के, कोई मेरा रह न गया परदेश में;
हठ के सजग खुमार में,
मुखर मौन की धार में,
डूब-डूब कर कोई उतराता होगा!
 
मैं उस पार खड़ा करुणा के देह पड़ी इस पार है,
विरह कठोर आज का जितना, उतना ही सुकुमार है;
कसक बसा दी गई गुलाबों में जाने किसी हाथ से,
बढ़ती जाती ख़ुशी आज के सूनेपन के साथ से;
चूम-चूम लेता हूँ दर्पण, झर पड़ती मुस्कान है,
एक अनूठे पागलपन से हुई नई पहचान है;
सुधियों के व्यवहार से,
फूलों-वाले वार से,
बात-बात में कोई झुंझलाता होगा!

आँसू है वह कौन, कि जिसकी सुन ली गई पुकार है,
हिचकी ऐसी कौन, कि जिसके पीछे नहीं कतार है;
मधु ने बाँह गही क्या जाने किस सुकुमारी आह की,
रवि ने कर दी लाल मांग किस सूरजमुखी कराह की;
उत्तर मिल जाएँगे मुझको उस क्षण अपने-आप ही,
जब आभास नहीं, सम्मुख होगा खुद खड़ा मिलाप ही;
कोई हँसमुख मान से,
चुम्बन के परिधान से,
सूखे अधर, भर दृग सहलाता होगा!