भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

आँसूराम कोतवाल / संजय चतुर्वेदी

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

फ़िक़्रो-फ़न का इनामी ख़लीफ़ा बेख़ुदी के मज़े ले रिया है
जैसे दिल में अपुन क्रान्तिकारी दिल्लगी के मज़े ले रिया है

नूरे यज़्दाँ विसाले सनम भी ये भी दे दो मुझे वो भी दे दो
वासना के उजाले में आदम हड़बड़ी के मज़े ले रिया है

हुक़्म देते हैं बन्दे ख़ुदा को छोड़ हम, सबको बातिल बताना
मेरा अल्हम्दुलिल्लाह मालिक नौकरी के मज़े ले रिया है

राजनीतिक सवालों का मसला सिरियस हो रहा है हमेशा
ये अलग बात है उसका दरशन मसख़री के मज़े ले रिया है

दुख हैं भोले अदाएँ सयानी रौशनी में हईम पिन्हाँ अँधेरे
वीर बालक शहादत की मीठी गुदगुदी के मज़े ले रिया है

इन्कलाबी धरा भेस हमने चार सू हो गई बल्ले-बल्ले
कोई जन की कोई संस्कृति की चाँदनी के मज़े ले रिया है

दस घरों में जले जिनसे चूल्हा उनसे आई है छोटी सी बोतल
इस नशीले हुनर का खिलाड़ी मुफ़लिसी के मज़े ले रिया है

जिस अहद को तगाफ़ुल किया था उसकी ले ली है सारी मलाई
हर इदारे में बैठा सयाना गड़बड़ी के मज़े ले रिया है

दूर से देखता है मुसाफ़िर कैसे-कैसे बयां आ रहे हैं
मरने वाला तड़ीपार हो के ज़िन्दगी के मज़े ले रिया है

जिनको फेंका था रद्दी में हमने हम उन्हीं के बगल में गिरे हैं
वक़्त है वो मुकम्मल कबाड़ी हर किसी के मज़े ले रिया है

(2013)