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उल्लू / रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’

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उल्लू का रंग-रूप निराला ।
लगता कितना भोला-भाला ।।

अन्धकार इसके मन भाता ।
सूरज इसको नही सुहाता ।।

यह लक्ष्मी जी का वाहक है ।
धन-दौलत का संग्राहक है ।।

इसकी पूजा जो है करता ।
ये उसकी मति को है हरता ।।

धन का रोग लगा देता यह ।
सुख की नींद भगा देता यह ।।

सबको इसके बोल अखरते ।
बड़े-बड़े इससे हैं डरते ।।

विद्या का वैरी कहलाता ।
ये बुद्धू का है जामाता ।।

पढ़-लिख कर ज्ञानी बन जाना।
कभी न उल्लू तुम कहलाना।।