भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

कारख़ानों की आवाज़ें / मरीना स्विताएवा / वरयाम सिंह

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

लोगों के होंठों पर है जो किताब
व्यर्थ नहीं है पलटना उसके पन्ने — 
अन्तिम, नगर के अन्तिम द्वार के पास
जहाँ से आरम्भ होती है घास

जहाँ से आरम्भ होती है सच्चाई
चट्टान पर बैठे
पक्षियों के झुण्ड उड़ जाने के बाद
दूर, सबसे दूर जाती हुई वह
दूरस्थ से भी दूर वह कहती है
"आऊँगी
और आऊँगी ताबूत में भी !"
मुश्किल से सांस लेती
हमारे कर्मों की जाँच पड़ताल करती
वह नौकरानी — चिमनी,

चिर स्वीकृत पशुता
और कोढ़ी शैशव के शहर के ऊपर
धुन्धले दिन में शर्मनाक कामों के ठिकानों की तरह
उठी हुई जैसे एक उँगली !

ख़ानों और तहख़ानों की आवाज़,
सूखे ठूँठों पर बजते माथों की आवाज़ !
अनाथ शिशुओं की आवाज़,
निर्दयी व निर्दयता में न्यायप्रिय लोगों की आवाज़

शैतान ने जिसे एक पैसे में ख़रीदा
उस सबकी आवाज़
सब चारपाइयों की आवाज़
सब लीवरों और बल्बों की आवाज़ ।

तुम्हारे उन तहख़ानों की आवाज़
जहाँ उम्र बीत जाती है धूप देखे बिना ।
जिसे जूठन भी हासिल न हो
उसका कौन होगा अपना कहने को ।

हिल भी नहिं सकती वह आवाज़
बन्धा रहना पड़ा है उसे जन्म से ।
इस मूसलाधार बारिश में भी
चुप नहीं होती सिलाई करतीं छोकरियों की आवाज़ ।

काली धोबिनों की खाँसी,
जुओं और सीलन से परेशान ।
चीख़ ... उस जगह की जो ख़ून से है लथपथ
जहाँ लोग लड़ते हैं और प्यार करते हैं ।

राख में सिर पटकने की आवाज़
आवाज़ तुम्हारी विनम्रता से टकराने की ।
( मैं पहचानती हूँ
निर्वस्त्र स्वाभिमानी की अपनी यह आवाज़ !)

हर रात गूँजता
तुम्हारे सौन्दर्य का गीत !
कहो सबके सामने — 
कौन आया चोर दरवाज़े से ज़िन्दगी में,
कौन चला गया है चुपके से मौत की तरफ़

अन्तिम, सबसे अन्तिम नगर-द्वार के पास
वहाँ जहाँ सब ठीक है अपनी-अपनी जगह,
इसलिए कि सब है अधिकारविहीन
पत्थर पर खड़े
ताज़ा घास की चमक में ।

और अज्ञात मीनार से टकराते हुए
क़ैदियों की चीख़ों का
 सामना करती है
अलौकिक सत्य की आवाज़
लौकिक सत्य के विरुद्ध ।

26 सितम्बर 1922
मूल रूसी से अनुवाद : वरयाम सिंह