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गमिष्यतिपतिका / रस प्रबोध / रसलीन

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गमिष्यतिपतिका

जाको पिय कछु दिन मैं चलनहार होइ तामें
मुग्धा गमिष्यतिपतिका

जो नवला मन मैं दयो नयो नेह तरु लाइ।
बिरहताप रितु बात तै जनु डारयौ कुँभिलाइ॥427॥
रवन गवन सुनि कै स्रवन दृग देखन मिसि ठानि।
तिय अंजन धोवन लगी अँसुवन को जल आनि॥428॥

मध्या गमिष्यतपतिका

कहन चहत पिय गवन सुनि कयों न मुख ते जाइ।
लाज मदन को झगरिबो धन हिय होत लखाइ॥429॥

प्रौढ़ा गमिष्यत्पतिका

कातिक पून्यौ अंत सुनि परबा पिय प्रस्थान।
कामिनि मुख ससि को भयौ अगहन गहन समान॥430॥
पहिले पाँखन आइ है पिय असाढ़ के मास।
प्रथमहिँ झरि छिति बासु लौं निकसी पैहों सांस॥431॥

परकीया-गमिष्यतिपतिका

मिलन धरी लौ ज्यौं प्रथम दुख दीन्हौं तुव स्याम।
सो चाहत हौ अब दयौ लै विदेस को नाम॥432॥

सामान्या गमिष्यतपतिका

रच्यो गवन तो करि कृपा मोहि दीजियौ लाल।
जिय राखन कों उरबसी नाम जपन कों माल॥433॥

गच्छतपतिका
जिसको पिय चलने के समय में हों तामें
मुग्धा-गच्छतपतिका

ज्यौ ज्यौ लालन चलन की प्रात घरी नियरात।
त्यौ त्यौ तियमुख चंद की जोति घटत सी जात॥434॥

मध्या-गच्छत्पतिका

पिय के चलत विदेस कछु कहि नहिं सके लजोरि।
चरन अँगूठा ते रहे दाबि पिछौरी छोरि॥435॥
पिय बिछुरन खिन यौ डरै तिय असुँधा चख आइ।
मनु मधुकर मकरंद कौ उगलि गयो फिरि खाइ॥436॥
रे तन जड़ तेरो कही कहा होइगो रंग।
घरी एक में चलत है जिय तो पिय के संग॥437॥
गवन समै पिय के कहति यौं नैनन सों तीय।
रोवन के दिन बहुत हैं निरख लेहु खिनि पीय॥438॥

परकीया-गच्छतपतिका

करी देह जो चीकनी हरि नित लाइ सनेह।
बिरह अगिन परि छिनिक मैं होइ चहत अब खेह॥439॥

सामान्या-गच्छतपतिका

पहिले वितु दै आपुनो जो कीन्हौं चित हाथ।
सोहित तोरि विदेस कों कत चलियत अब नाथ॥440॥

आगमिष्यतपतिका
जिसका पति विदेस से आनेवाला हो उसमंे
मुग्धा-आगमिष्यतपतिका

दिन द्वै मैं मिलिहैं इन्हैं पिय विदेस तें आइ।
सखियन सों यह सुनि तिया अखियन रही लजाइ॥441॥

बाम नन फरकत भयो बाम जो आनँद आइ।
खिनि उघरति खिनि मुँदति है बादर धूप सुभाइ॥442॥

प्रौढ़ा-आगमिष्यतपतिका

पतिया आई अरु सुनौ पिय आगमन प्रकास।
याते कामिनि प्रान को उपज्यो दुगुन हुलास॥443॥
नैन बाम की फरकि लहि अरु बोलत सुनि काग।
अंग अंग तिय पै लग्यो बरसन आनि सोहाग॥444॥

परकीया-आगामिष्यतपतिका

हरि आगम सुनि पथिक मुख उमगे सहित सनेह।
नख ते सिख लौं नारि की भई चीकनी देह॥445॥

सामान्या-आगभिष्यतिपतिका

आबत सुनि परदेस तें धनी मित्र तेहि आस।
बारविलासिन के भयो बारहि बार विलास॥446॥

आगच्छतपतिका
जो तिय विदेश से आगमन सुने उसमें
मुग्धा-आगच्छतपतिका

पिय आये यह सुनि भयौ हरख जो नवला आइ।
कमल कली लौं अरुनता कछु मुख पै दरसाइ॥447॥

मध्या-आगच्छतपतिका

लाजवती परदेस तें पिय आयौ सुधि पाइ।
निसिदिन मधु के कमल सम सकुचत विकसत जाइ॥448॥

प्रौढ़ा-आगच्छतपतिका

पिय आवन सुनि कै तिया यह मन मैं पछिताइ।
पंख नहीं जौं उड़ि मिलौं सब तें पहिले जाइ॥449॥

परकीया-आगच्छतपतिका

आवन सुनि घनस्याम की आन देस तें बात।
चपला ह्वै चमकन लग्यौ नेहन हीं को गात॥450॥

सामान्या-आगच्छतपतिका

धनी मित्र आगमन सुनि सजि सिंगार अभिराम।
बैठी बाहर नगर के डगर बाँधि कै बाम॥451॥

आगतपतिका
जिसके पिय परदेश से आ मिलें उसमें
मुग्धा-आगतपतिका

बिछुरि मिल्यौ पिय बाँह गहि ज्यौं ज्यौं पूछत जात।
बूड़ी लाज समुद्र तिय मुख ते कढ़त न बात॥452॥
पिय आयौ आनंद जो भयो नवल तिय आइ।
घटमधि दीपक जोति लौं मुख तें कछुक लखाइ॥453॥

मध्या आगतपतिका

आयो पिय परदेस ते तिय बैठी सकुचाइ।
तिरछी आँखिन तें कछू लखत कनाखि जनाइ॥454॥

प्रौढ़ा आगतपतिका

पिय लखि यौं तिय दृगन कै अंजन अँसुवा ढारि।
प्यौ ससि निरखि चकोर दे बुझी चिनगिनी डारि॥455॥
तिय हँसि बतिया करन में अँसुवा ढारति जाइ।
मिलन बिरह सुख दुख कहति भई फूलझरी भाइ॥।456॥
सुख ई बिछुरन सिसिर की ह्वै लहलही तुरंत।
बेलि रूप प्रफुलित भई लहि बसंत सो कंत॥457॥

परकीया-आगतपतिका

गये बीति दिन बिरह के आयी निसि आनंद।
प्रेम फँदी कुमुदिनि भई निरखत ही बृजचंद॥458॥

सामान्या-आगतपतिका

तुव बिछुरत तन नगर में बिरह लुटेरे आइ।
मेरे सुबरन रूप कौ लीन्हौं लूटि बनाइ॥459॥

आगतपतिका
संजोगगर्विता-लक्षण

पिय आये परदेस ते गरब होइ जेहि बाल।
सो सँजोग गर्वित तिया जानत सुकवि रसाल॥460॥

उदाहरण

कहाँ गये हैं जलद ये नित उठि जारत आइ।
गाइ मलार बुलाइयतु तऊ न परत लखाइ॥461॥