(27)
"भाई को सो करौं, डरौं कठिन कुफेरै |
सुकृत-सङ्कट पर्यो, जात गलानिन्ह गर्यो ,
कृपानिधिको मिलौं पै मिलिकै कुबेरै ||
जाइ गह पाँय, धाइ धनद उठाइ भेट्यो,
समाचार पाइ पोच सोचत सुमेरै |
तहँई मिले महेस, दियो हित उपदेस,
रामकी सरन जाहि "सुदिनु न हेरै ||
जाको नाम कुम्भज कलेस-सिन्धु सोखिबेको,
मेरो कह्यो मानि, तात!बाँधे जिनि बेरै |
तुलसी मुदित चले, पाये हैं सगुन भले,
रङ्क लूटिबेको मानो मनिगन-ढेरै ||