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ज़िक्रे-एहवाले-दिले-ज़ार करूँ तो कैसे / कांतिमोहन 'सोज़'

ज़िक्रे-एहवाले-दिले-ज़ार करूँ तो कैसे ।
शेर को वक़्त की गुफ़्तार करूँ तो कैसे ।।

ये मेरे जिस्म को कर डालेंगी पुर्ज़ा-पुर्ज़ा
इन हवाओं को गिरफ़तार करूँ तो कैसे ।

महवे-ग़फ़लत को तो एक बार जगा सकता हूँ
होशमन्दों को ख़बरदार करूँ तो कैसे ।

जज़्बए-इश्क़ जहाँ बिकने पे आमादा हो
मैं ग़ज़ल को वहाँ खुद्दार करूँ तो कैसे ।

सोज़ वो शोखिए-अन्दाज़ कहाँ से लाऊँ
यार कमगो को तरहदार करूँ तो कैसे ।।

14-2-1988