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जौहर / श्यामनारायण पाण्डेय / आखेट / पृष्ठ ३

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मार डालने का घोड़े को
था उस वैरी - दल का दावा।
साफ साफ बच जाता था, पर
घोड़ा काट काटकर कावा॥

हाय गिरी तलवार किसी की,
घोड़े की अगली टाँगों पर।
खड़ा हो गया वीर तुरंगम,
शक्ति लगा पिछली टाँगों पर॥

यह लो पिछली टाँगों से भी
उलझी अरि की क्रूर कटारी।
हा तुरंग के करुण - नाद से
काँप उठी वन की भू सारी॥

हय का काम तमाम अचानक,
पलक मारते वहीं हो गया।
कातर आँखों से स्वामी की
ओर देखता वहीं सो गया॥

उस घोड़े को मरे न जाने,
कितने दिन, वत्सर, युग बीते।
किंतु आज भी उसी वाजि के
वीर - गान गाकर हम जीते॥

जो हो पथिक, कर्म का फल तो
जीव जीव को मिलता ही है।
निरपराध - वध - महापाप से
विधि का आसन हिलता ही है॥

वीर सती ने जिस रावल को
अपनी फुलझड़ियों से बाँधा।
अरि के गुप्तचरों ने उसको
लोहे की कड़ियों से बाँधा॥

उधर पथिक, रवि ने लाली से
तुरत छिपा ली शोणित - लाली।
रजनी ने भी डाली उस पर
अंधकार की चादर काली॥

दृश्य देखने को लालायित
जगमग जगमग तारे आए।
देख न सके गगन से जब तब,
ओसों के मिस भू पर छाए॥

बोल उठा योगी से राही,
रावल का क्या हाल हुआ?
क्या अनमोल रतन को पाकर
खिलजी मालामाल हुआ?

अब आगे की कहो कहानी
वैरी का दरबार कहो।
साथ रतन के उस उत्पाती
खिलजी का व्यवहार कहो॥

उठी विकल तुलसी की माला
फेर पुजारी बोल उठा।
खिलजी का निःसीम गर्व सुन
राही का मन डोल उठा॥

किंतु कथा के बीच बोलने
का उसको साहस न हुआ।
खिलजी को उत्तर देता, पर
गत – प्राणी पर वश न हुआ॥

नारायण मंदिर, द्रुमग्राम (आज़मगढ़)
विजयादशमी, संवत १९९७