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पत्थरों से तो सर बचा आये / डी. एम. मिश्र
Kavita Kosh से
पत्थरों से तो सर बचा आये
चोट फूलों की मार से खाये
सारी दुनिया को जीतकर लौटे
मात परिवार से अपने खाये
योग्यता काम तब नहीं आती
जब भी अपनों से जंग छिड़ जाये
दूसरों को सलाह खूब दिए
खुद के मसलों को हल न कर पाये
ख़्वाब कितने हसीन पाले थे
दफ़्न हाथों से अपने कर आये
ॠतु बदलने से यह कहाँ होता
सूखे तरुवर में फूल फल आये
जब अँधेरी गली से गुज़रा तो
छोड़ मुझको गये मेरे साये