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बड़ा रंग लाया हैमेरा ग़ज़ल लिखना भी / कबीर शुक्ला

बड़ा रंग लाया है आज मेरा ग़ज़ल लिखना भी।
महबूब के चेहरे को गुलाब कवँल लिखना भी।
 
आरिंद को गुलिस्ताँ अब्सारों को दरिया लिखना,
उसके गेसू-ए-शबगूँ को घना बादल लिखना भी।
 
शक्ल-ए-ज़मील को जेबाई-ए-महबाब लिखना,
उसे ख़ुदा ख़ुद को उसका कायल लिखना भी।
 
सादिक गुलबदन खुशरवे-शीरीदहना लिखना,
ख़ुद ग़फ़लत-शिआर उसे अव्वल लिखना भी।
 
गोशा-गोशा मेरे आशियाँ का महका जाता है,
ख़ुश्बू-ए-जिस्मे-नाजनीं को संदल लिखना भी।
 
इब्तिशाम अता करता है मेरे अह्दे-हिज़्र को,
दिले-बेक़रार को खुशियों का महल लिखना भी।
 
नादाँ नाकर्दकार को सुकूने-कल्ब देता है 'कबीर' ,
ख़्वाबे-परीशाँ को बारहाँ मुकम्मल लिखना भी।