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बढ़ते-बढ़ते / केदारनाथ अग्रवाल
Kavita Kosh से
बढ़ते-बढ़ते
बढ़ गया लोकतंत्री जीवन में
आसुरी उत्पात;
आतंकित हैं सभी
छोटे-बड़े लोग,
आसुरी अस्मिता वाले राज दरबार में।
होते-होते
होने लगे हैं
राह चलते हमले-
जघन्य-से-जघन्य अपराध;
मौत से पहले
मारे जाने लगे हैं
जवान-जवान लोग।
आदमी अब हो गया है
काँव-काँव करते कौओं के
मुँह का कौर।
गाँव और शहर
त्रासदी भोगते हैं।
देश में देश के लोग,
बच-बचाकर,
जीने का रास्ता
खोजते हैं।
रचनाकाल: २०-०८-१९७८