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महताब भी मोहताज़ होगा महबूब के दीदार का / कबीर शुक्ला

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महताब भी मोहताज़ होगा महबूब के दीदार का।
तारीक में नूरे-सहर मानिंद अक्से-रुख़े-यार का।
 
हुस्न-ओ-शबाब-ए-नाज़नीन-ए-निग़ार के सामने,
फ़ीका लगता है सतवत-ओ-ऐवान ज़रदार का।
 
उसके हसीन-ओ-मुनक्कश-रू को देख-देखकर,
शर्माता होगा गुले-गुलजार मौसम चमनगार का।
 
मौजे-नसीम से उसकी ख़ुश्बू, आवाज़ह सुनकर,
तलबगारे-दीदे-यार होता दिल वफाशेआ' र का।
 
उसकी बर्क-सिफ़ात नज़रों से रूबरू होकर के,
एस्तादा रहना मुश्किल है दिले-नाकर्दकार का।
 
वो रानाई-ए-हर्फ़ है वह शान-ए-ग़ज़ल-मुशायरा,
इस्तिआरे-तशबीहो वह शायर के अफ़कार का।
 
सब्र-आज़मा तिलिस्मे-मजाज़ हुस्न बनाने में,
दस्ते-क़ुदरत है या करिश्मा परवरदिगार का।