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राम की कृपालुता / तुलसीदास / पृष्ठ 9

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राम की कृपालुता-7


( छंद संख्या 17,18)

(17)

कीबेको बिसोक लोक लोकपाल हुते सब,
 कहूँ कोऊ भो न चरवाहो कपि-भालुको।

 पबिको पहारू कियो ख्यालही कृपाल राम,
 बापुरो बिभीषनु घरौंधा हुतो बालुको।।

 नाम-ओट लेत ही निखोट होत खोटे खल,
 चोट बिनु मोट पाइ भयो न निहालु को?

तुलसीकी बार बड़ी ढील होति सीलसिंधु !
बिगरी सुधारिबेको दूसरो दयालु को।17।


(18)

नामु लिएँ पूतको पुनीत कियो पातकीसु,
 आरति निवारी ‘प्रभु पाहि’ कहें पीलकी।

छलनि छोंड़ी, सो निगोड़ी छोटी जाति-पाँति,
 कीन्ही लीन आपुमें सुनारी भोंड़े भीलकी।।

 तुलसी औ तोरिबो बिसारिबो न अंत मोहि,
नीकें हैं प्रतीति रावरे सुभाव-सीलकी।।

देऊ , तौं दयानिकेत, देत दादि दीननको,
मेरी बार मेरें ही अभाग नाथ ढील की।18।