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15:14, 17 अगस्त 2013 {{KKGlobal}}
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|रचनाकार=सलमान अख़्तर
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<poem>
ये तमन्ना है के अब और तमन्ना न करें
शेर कहते रहें चुप चाप तक़ाज़ा न करें
इन बदलते हुए हालात में बेहतर है यही
आईना देखें तो ख़ुद अपने को ढूँडा न करें
तू गुरेजाँ रही ऐ ज़िंदगी हम से लेकिन
कैसे मुमकिन है के हम भी तुझे चाहा न करें
इस नए दौर के लोगों से ये कह दे कोई
दिल के दुखड़ों का सर-ए-आम तमाशा न करें
</poem>
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