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15:39, 17 अगस्त 2013 {{KKGlobal}}
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|रचनाकार=मोहम्मद रफ़ी 'सौदा'
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<poem>
ऐ आह तेरी क़द्र असर ने तो न जानी
गो तुज को लक़ब हम ने दिया अर्श-मकानी
यक ख़ल्क़ की नज़रों में सुबुक हो गया लेकिन
करता हूँ मैं अब तक तेरी ख़ातिर पे गिरानी
टुक दीदा-ए-तहक़ीक़ से तू देख ज़ुलेख़ा
हर चाह में आता है नज़र युसूफ़-ए-सानी
मामूर है जिस रोज़ से वीराना-ए-दुनिया
हर जिंस के इंसाँ की ये माटी गई छानी
इस वामिक़-ए-नौ का है समझ चाक गिरेबाँ
करती है जो रख़्ना कोई दीवार पुरानी
बुलबुल ही सिसकती न थी कुछ बाग़ में तुझ बिन
शबनम गुलों के मुँह में चुवाती रही पानी
है गोश-ज़दा ख़ल्क़ मेरा क़िस्सा-ए-जाँ-काह
जब से कि न समझे था तू चिड़िया की कहानी
जूँ शम्मा तुझे शर्म है ज़ुन्नार की ऐ शैख़
माला न जपूँ रात को बे-अश्क़-फ़शानी
जिस सम्त नज़र मौज़-ए-सराब आवे तो ये जान
होवेगी किसी ज़ुल्फ़-ए-चलीपा की निशानी
क्या क्या मिले लैला-मनशाँ ख़ाक में ‘सौदा’
गो अपने भी महबूब की देखी न जवानी
</poem>
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