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चलता राही जब मंज़िल को / रसूल हम्ज़ातव / मदनलाल मधु
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21:49, 4 फ़रवरी 2024
उनका कोई नहीं शुमार,
फिर भी चाहो तो संग ले लो
उसमें
नहिं
नहीं
ज़रा भी भार ।
'''मूल रूसी भाषा से अनुवाद : मदनलाल मधु'''
</poem>
अनिल जनविजय
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