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है ये अनुभव की बात माना कर / 'सज्जन' धर्मेन्द्र
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07:41, 26 फ़रवरी 2024
<poem>
है ये अनुभव की बात माना कर।
झूठ
झूट
खाता है मात माना कर।
लाल चश्मा पहन के कोई भी,
है ये आब-ए-हयात माना कर।
तम से डर-डर के जी न पायेगा,
रोज
रोज़
होती है रात माना कर।
</poem>
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