भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
Changes
Kavita Kosh से
'{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' }} {{KKCatKavita...' के साथ नया पृष्ठ बनाया
{{KKGlobal}}
{{KKRachna
|रचनाकार=रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'
}}
{{KKCatKavita}}
<poem>
सब भाव खो गए
जीवन खो गया
अचानक भला ये
क्या-क्या हो गया!
जब भाव थे मरे,
भाषा भी मरी
हर बाट हो गई
काँटों से भरी।
यूँ कहाँ मैं भला
अब ढूँढूँ तुम्हें
हर कोई यहाँ
शूल ही बो गया।
सूख गए सब रस
कविता खो गई
पथ भीगा मिला
यूँ साँझ हो गई ।
कंठ भी है रुँधा
स्वर भी गुम हुआ
पास में जो था
पता ही खो गया।
'''09-04-2024'''
</poem>
{{KKRachna
|रचनाकार=रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'
}}
{{KKCatKavita}}
<poem>
सब भाव खो गए
जीवन खो गया
अचानक भला ये
क्या-क्या हो गया!
जब भाव थे मरे,
भाषा भी मरी
हर बाट हो गई
काँटों से भरी।
यूँ कहाँ मैं भला
अब ढूँढूँ तुम्हें
हर कोई यहाँ
शूल ही बो गया।
सूख गए सब रस
कविता खो गई
पथ भीगा मिला
यूँ साँझ हो गई ।
कंठ भी है रुँधा
स्वर भी गुम हुआ
पास में जो था
पता ही खो गया।
'''09-04-2024'''
</poem>