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{{KKRachna
|रचनाकार=लेव क्रापिवनीत्स्की
|अनुवादक=वरयाम सिंह
|संग्रह=
}}
{{KKCatKavita}}
<poem>
'''(जैसे ही हम वास्तविकता को जानने का प्रयास करते हैं, वह गायब हो जाती है - कार्ल यास्पर्स)'''
चारों तरफ देखता हूँ —
शान्ति और प्रगति की राजधानी ।
सर्वाधिक बुद्धिमान विचारों का प्रवाह,
एक पूरी फौज
असैनिक वर्दी में साठ लाख मंदबुद्धि लोग,
उत्पादन का साधन-तलवार ।
(थोबड़ा भरा हुआ नीले दागों से
चमड़ी से चूती वोदका। )
ओ सुन्दरी ! कूड़े के पैकेट को ही अपना मर्द मान :
टी० वी० — पहला चैनल — तीन हज़ार सैकिण्ड
(अन्धों और भैंगों के लिए)
दूसरे चैनल पर स्मारक-ही-स्मारक (नियमत: घोड़ों पर सवार)
हर मकान के लिए दो या इससे अधिक भी ।
चार उँगलियाँ
इंगित करती हुई, निस्सन्देह, एक दूसरे को
पर बिना भर्त्सना के नहीं ।
इतना प्यारा, इतना मूर्ख और इतना दयनीय है फैन्या —
किर्ली-मिर्ली और अज्ञात दिक्कू औरत का बेटा —
काटकर खा गया है अपने ही कूल्हे ।
बाज़ारू नेतागिरी विज्ञान का प्रसिद्ध पी-एच०डी० भी
इसी विचार का है :
— बकवास करते चलो —
लेकिन ज़रूरत से ज़्यादा नहीं ।
</poem>
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|अनुवादक=वरयाम सिंह
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'''(जैसे ही हम वास्तविकता को जानने का प्रयास करते हैं, वह गायब हो जाती है - कार्ल यास्पर्स)'''
चारों तरफ देखता हूँ —
शान्ति और प्रगति की राजधानी ।
सर्वाधिक बुद्धिमान विचारों का प्रवाह,
एक पूरी फौज
असैनिक वर्दी में साठ लाख मंदबुद्धि लोग,
उत्पादन का साधन-तलवार ।
(थोबड़ा भरा हुआ नीले दागों से
चमड़ी से चूती वोदका। )
ओ सुन्दरी ! कूड़े के पैकेट को ही अपना मर्द मान :
टी० वी० — पहला चैनल — तीन हज़ार सैकिण्ड
(अन्धों और भैंगों के लिए)
दूसरे चैनल पर स्मारक-ही-स्मारक (नियमत: घोड़ों पर सवार)
हर मकान के लिए दो या इससे अधिक भी ।
चार उँगलियाँ
इंगित करती हुई, निस्सन्देह, एक दूसरे को
पर बिना भर्त्सना के नहीं ।
इतना प्यारा, इतना मूर्ख और इतना दयनीय है फैन्या —
किर्ली-मिर्ली और अज्ञात दिक्कू औरत का बेटा —
काटकर खा गया है अपने ही कूल्हे ।
बाज़ारू नेतागिरी विज्ञान का प्रसिद्ध पी-एच०डी० भी
इसी विचार का है :
— बकवास करते चलो —
लेकिन ज़रूरत से ज़्यादा नहीं ।
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