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{{KKRachna
|रचनाकार=रामदरश मिश्र
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एक महकती हुई लहर
हर क्षण निकल-निकल जाती है।
एक गुनगुनाता स्वर हर क्षण
कानों पर बह-बह जाता है
एक अदृश्य रूप सपने सा
एक वसंत द्वार से जैसे
मुझको बुला-बुला जाता है
मैं यही सोचता रह जाता हूँ
लहर घेर लूंलूँस्वर समेट लूंलूँरूप बांध लूंबाँध लूँऔ वसंत से कंकहूँ-रुको भी घडी घड़ी दो घडी घड़ी द्वारे मेरे
फिर होकर निश्चिंत
तुम सभी को मैं पा लूंलूँ
पर यह तो प्रवाह है
रुकता कहांकहाँ?एक दिन इसी तरह मैं चुक जाऊंगाजाऊँगा
कहते हुए-
आह! पा सका नहीं
कब तक प्रतीक्षा करोगे वसंत की?
सुनो,
वसंत लोहे के बंद दरवाजों पर हांक हाँक नहीं देतावह शीशे की बंद खिडकियों के भीतर नही झांकताझाँकता
वह सजी हुई सुविधाओं की महफिल में
आहिस्त-आहिस्ता आने वाला राजपुरुष नहीं है
बाहर निकलो
देखो
बंद दिशाओं को तोडतीतोड़तीधूलभरी हवाएं हवाएँ बह रही हैं
उदास लय में झरते चले जा रहे हैं पत्ते
आकाश म ेहूँलदा में लदा हुआ लम्बा-सा सन्नाटाचट्टान की तरह यहांयहाँ-वहां वहाँ दरक रहा है
एक बेचैनी लगातार चक्कर काट रही है
सारे ठहरावों के बीच
जमी हुई आंखें आँखें अपने से ही लडती हुई
अपने से बाहर आना चाहती है
आओ गुजरों इनसे
तब तुम्हें दिखाई पडेगी
धूप भरी हवाओं के भीतर बहती
रंगों की छोटी-छोटी नदियांनदियाँ
पत्तियों की उदास लय में से उगता
नए हरे स्वरों का एक जंगल
नंगे पेडों पेड़ों के बीच कसमसाता
लाल-लाल आभाओं का एक नया आकाश
चट्टानों को तोड-तोड कर झरने के लिए आकुल
प्रकाश के झरने
तुम कब तक प्रतीक्षा करते रहोगे वसंत की
बंद कमरों में तुम्हें पता नहीं
बाहर तो वसंत आ चुका है।
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