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शरशय्या / तेसर सर्ग / भाग 20 / बुद्धिधारी सिंह 'रमाकर'

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रोकि न सकला करुणभावकें
विभु करुण क निकेत।
छल जे बिकसित अन्तर सुममे
भक्ति भ्रमरसंकेत।।123।।

श्रीकर सविध सबिधि कए अर्पित
पुलकित मात अनन्य।
जग क्षेमक हित दान अमरसँ।
सुकृत बनाओल धन्य।।124।।

प्ररब्रह्म पद धएल प्रफुल्लित
मानस गुणगण-आकर।
शिशुगण सुखमय जीवन पावथु
भाषल पंक्ति रमाकर।।125।।

निधिरस देव ब्रह्म सम्बत्सर
कार्त्तिक धवल त्रयोदशि जानि।
भीष्म पंचकक मध्य प्रपूजित
पूजल जननी वाणी मनि।।।।126।।