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शरशय्या / पहिल सर्ग / भाग 4 / बुद्धिधारी सिंह 'रमाकर'

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चरित एक उज्ज्वल लासत
जानए जनिकर लोक।
बरए हुनक यश दीप नित
सातो भुवनक लोक।।16।।

नेनहमे तजि मोहके
चलि गेली हुनि माए।
छली दिव्य ओ नारि ते
भेल न कृत्य बेजाय।।17।।

किन्तु मातृपालन विरत
पबइत पितृदुलार।
शान्तनुसँ पाओल अखिल
सत-स्नेहक सार।।18।।

कौलिक बुद्धिक संगमे
पावि विमल सत्संग।
बढ़ल हुनक प्रतिभाक शशि
शुक्ल पक्ष जनु संग।।19।।

कए व्यायामहिं पुष्ट तन
गात अपन ओ धीर।
होथि न कखनहुं गुरुक लग
अनुशासनहिं अधीर।।20।।