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सौत-ए-बुलबुल दिल-ए-नालाँ ने सुनाई मुज को / क़लंदर बख़्श 'ज़ुरअत'

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सौत-ए-बुलबुल दिल-ए-नालाँ ने सुनाई मुज को
सैर-ए-गुल दीदा-ए-गिर्यां ने दिखाई मुज को

लाऊँ खातिर में न मैं सल्तनत-ए-हफ्त इकलीम
उस गली की जो मयस्सर हो गदाई मुज को

वस्ल में जिस की नहीं चैन ये अँदेशा है
आह दिखलाएगी क्या उस की लड़ाई मुज को

वस्ल में जिस के न था चैन सो ‘जुरअत’ अफसोस
वो गया पास से और मौत न आई मुज को