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कादम्बरी / पृष्ठ 126 / दामोदर झा

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39.
नभ मण्डलहिं विमान एक देवक सम्मुखे अबै छल
वामा दहिना नहि जा हम तनिका ऊपरसँ तड़पल।
क्रोधित भेल शाप दय देलनि अश्व जकाँ तड़पै छै
अश्व शरीर पाबि भूतलमे बहुत दिवस धरि रहबे॥

40.
हाथ जोड़ि हम कहल शोकसँ आन्हर छी नहि बुझलहुँ
तपोगर्वसँ नहि ई कयलहुँ अपनेके नहि जनलहुँ।
मित्र मुइल छथि हुनक पिताके कहबा लय जाइत छी
छमा करू अपराध अजानक अपनहि हम लज्जित छी॥

41.
ओ कहलनि मिथ्या नहि हयते क्रोधे जे हम कहलहुँ
कयल अनुग्रह दीन दशा लखि जे किछु सुविधा जनलहुँ।
तारापीड़ भूप सेबथि बेटा लय तीननयनके
पुण्डरीककेर शापे हिमकर सन्तति हयता हुनके॥

42.
हुनक सचिव शुकनासक सन्तति पुण्डरीक भय जयता
चन्द्र अंश चन्द्रापीड़क प्रिय वैशम्पायन हयता।
चन्द्रापीड़क वाहन बनल अहाँ भरि जीवन रहबे
हमर प्रभावे अहू जनम केर सब विवरा मन गहबे॥

43.
चन्द्रापीड़क मुइला पर जैखन सर डूबि नहायब
तैखन इएह कपिंजल निज तन ज्ञान सहित पुनि पायब।
एतबा कहि अपना रुचि गेला ओ हम जलनिधि खसलहुँ
परम मनोहर तेज चालि घोड़ा बनि गरुड़हुँ हसलहुँ॥