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कभी / हरीसिंह पाल

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इतने संघर्षों,
इतने अनवरत प्रयासों के बावजूद
अगर कुछ नहीं बन पाए
तो क्या अपनी ही कमी है?
अपना ही दोष है?
अपना कर्मफल है,
क्या उस नियन्ता का नहीं?
जो इस जगत को नियंत्रित कर रहा है।
अगर हम नियंत्रित हो रहे थे
तो क्या उसका दायित्व नहीं था
हमें नियंत्रित करने का?
सही मार्ग पर लाने का!
उस निर्माता का दोष नहीं
उसने हमें अधूरा बनाया ही क्यों?
वह उसकी कमजोरी नहीं
यह सब कुछ जानते हुए भी,
अनजान बना रहा।
क्या उस परमेश्वर-पालक का दोष नहीं
जिसने हमें ठीक से पाला ही नहीं
हम तो किए ही जाएंगे, अपना कर्म
उसका फल अच्छा मिले या बुरा
मगर ऐ नियन्ता, निर्माता और पालक,
क्या बच पाओगे इस दायित्व से।
तुम्हारी छत्रछाया में पलते हुए भी,
हम अधूरे ही क्यों बन पाएं?