Last modified on 29 मई 2014, at 10:15

यक किसान की रोटी / वंशीधर शुक्ल

Sharda suman (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 10:15, 29 मई 2014 का अवतरण ('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=वंशीधर शुक्ल |अनुवादक= |संग्रह= }} {{KK...' के साथ नया पन्ना बनाया)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)

यक किसान की रोटी,जेहिमाँ परिगइ तुक्का बोटी
भैया!लागे हैं हजारउँ ठगहार।
हँइ सामराज्य स्वान से देखउ बैठे घींच दबाये हइँ
पूँजीवाद बिलार पेट पर पंजा खूब जमाये हइँ।
गीध बने हइँ दुकन्दार सब डार ते घात लगाये हइँ
मारि झपट्टा मुफतखोर सब चौगिरदा घतियाये हइँ।
सभापती कहइँ हमका देउ, हम तुमका खेतु देवाय देई
पटवारी कहइँ हमका देउ, हम तुम्हरेहे नाव चढाय देई।
पेसकार कहइँ हमका देउ, हम हाकिम का समुझाय देई
हाकिम कहइँ हमइँ देउ, तउ हम सच्चा न्याव चुकाय देई।
कहइँ मोहर्रिर हमका देउ, हम पूरी मिसिल जँचाय देई
चपरासी कहइँ हमका देउ, खूँटा अउ नाँद गडवाय देई।
कहइँ दरोगा हमका देउ, हम सबरी दफा हटाय देई
कहइँ वकील हमका देउ, तउ हम लडिकै तुम्हइ जिताय देई।
पंडा कहइँ हमइँ देउ, तउ देउता ते भेंट कराय देई
कहइँ ज्योतिकी हमका देउ, तउ गिरह सांति करवाय देई।
बैद! कहइँ तुम हमका देउ, तउ सिगरे रोग भगाय देई
डाक्टर कहइँ हमइँ देउ, तउ हम असली सुई लगाय देई।
कहइँ दलाल हमइँ देउ, हम तउ सब बिधि तुम्हँइ बचइबै,
हमरे साढू के साढू जिलेदार।
यक किसान की रोटी,जेहिमाँ परिगइ तुक्का बोटी
भैया!लागे हैं हजारउँ ठगहार।