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काम / सुरेन्द्र झा ‘सुमन’

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पांचालक राजा ‘दुर्मुख’ छल बैसल महल - अटारी
देखल पथपर चलइत चंचल गाय-साँढ़ केर धारी
एक साँढ छल काम - विवश कोनहु धेनुक दिस लागल
सहसा आन दिसासँ दोसरो, जद्धत दौड़ल आयल
मचल द्वन्द्व स्वच्छन्द, प्रतिद्वंद्वी भोंटो पुनि फाड़ल
तकरहुपर झट दौड़ि तेसरो, ओकरहु उदर विदारल
काम प्रवृत्ति क्रोध-मूलक थिक, क्रोधे स्व-पर-विनाशी
जे न बुझथि से जाथि नाशपथ, कहथि भूप संन्यासी