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जब वलवला सादिक़ होता है जब अज़्म मुसम्मम होता है
तकमील का सामाँ ग़ैब से ख़ुद उस वक़्त फ़राहम होता है
 
अंजाम-ए-वफ़ा भी देख लिया अब किस लिए सर ख़म होता है
नाज़ुक है मिज़ाज-ए-हुस्न बहुत सज्दे से भी बरहम होता है
ये आग दहकती है जितनी उतना ही धुआँ कम देती है
रग रग में निज़ाम-ए-फ़ितरत की रक़्साँ है मोहब्बत की बिजली
हो लाख तज़ाद अज़दाद में भी इक राब्ता बाहम होता है
 
मिल-जुल के ब-रंग-ए-शीर-ओ-शकर दोनों के निखरते हैं जौहर
दरियाओं के संगम से बढ़ कर तहज़ीबों का संगम होता है
ताराज नशेमन खेल सही सय्याद मगर इतना सुन ले
दीवानों के जेब-ओ-दामन का उड़ता है फ़ज़ा में जो टुकड़ा
मुस्तक़बिल-ए-मिल्लत के हक़ में इक़बाल का परचम होता है
 
मंसूर जो होता अहल-ए-नज़र तो दावा-ए-बातिल क्यूँ करता
उस की तो ज़बाँ खुलती ही नहीं जो राज़ का महरम होता है
 
ता-चंद 'सुहैल' अफ़्सुर्दा-ए-ग़म क्या याद नहीं तारीख़-ए-हरम
ईमाँ के जहाँ पड़ते हैं क़दम पैदा वहीं ज़मज़म होता है
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