खलीला जी छांड़ दो तिरक्कुनी मोरी।
नहिं हम माधो साहु न पन्ना ना हम भारथ दास।
रामदास ना दुरगा हम बस जाओ न आओ पास।
बकरी-सी दाढ़ी और सूरत तापैं रहे इठलाय।
हमसे सीधे से रहिए नहिं जै हौ तमाचे खाय॥
खलीला जी छांड़ दो तिरक्कुनी मोरी।
नहिं हम माधो साहु न पन्ना ना हम भारथ दास।
रामदास ना दुरगा हम बस जाओ न आओ पास।
बकरी-सी दाढ़ी और सूरत तापैं रहे इठलाय।
हमसे सीधे से रहिए नहिं जै हौ तमाचे खाय॥