तिलिस्म और मालगाड़ी / दिनेश कुमार शुक्ल

तेज बारिश की झड़ी
खड़ताल-सी बजती हुई दुपहर
धमकती जा रही है मालगाड़ी
मालगाड़ी पर लदा कोयला
भरी है आग कोयले में
छुपी है आग में बिजली
कि जिससे मालगाड़ी चल रही है।

और वह ब्रेकवान में
बक्से पे बैठा जा रहा है
सोचता-यह कौन किसको चलाता है
हरी झंडी-लाल झंडी
कभी रुकना कभी चलना
और फिर पटरी बदलना

और यह कोयला कभी जो था घना जंगल
जहाँ पर बिचरते थे डायनासर
कि जिनसे बच के जिन्दा बने रहना
तब नहीं इतना असंभव था
कि जितना आज

आज उनकी देह छोटी हो गई है
भूख लेकिन बढ़ गई है
सोख लेते वे नदी-नद झील-सागर
चर गये सब खेत-जंगल
पी गये सारी हवायें
भावना की भूमि तक में
घुस गये हैं डायनासर
और उनकी दाढ़ में अब
लग चुका है स्वाद सपनों का
धमकती जा रही है मालगाड़ी
काँपती धरती बिखरता समय
जीवन पिस रहा है
हाथ ये किसका
पकड़ कर आदमी को जो
रगड़ कर घिस रहा है
तेज बारिश की झड़ी
तेजाब की बूंदें कि लोहा गल रहा है
आत्मा में बचा था
जो कहीं थोड़ा जल
पकड़ कर आग वो भी जल रहा है

जा रही है मालगाड़ी
किन्तु उल्टे घूमते चक्के
नियंत्रण खो रहा है
और चालक सो रहा है
और वह जो आखिरी डिब्बे पे
बैठा है सवार
देखता पीछे-
झपट कर छूटता संसार
वही पहले छूटता है
दूर फिंकता हुआ
जो सबसे निकट था

कुछ देर देता साथ
वह जो दूर का संसार
चलता हुआ वृत्ताकार
वह भी मान लेता हार आखिरकार
थोड़ी देर में, खोता हुआ आज
उस गहरे क्षितिज में

जा रही है मालगाड़ी
और बारिश हो रही है
और दुपहर सो रही है
धुंध गहरी हो रही है
मालगाड़ी खो रही है

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