नदी और नक्षत्र / दिनेश कुमार शुक्ल

शान्त औ निःशब्द गंगा बाढ़ में इठला रही है
हर तरफ जल है

वनस्पति में सर्प में चट्टान में
गिरि-गुहा-गह्वर में गगन में
हवा में मन में नयन में
हर तरफ जल है-
जल भरा संसार अपरम्पार पारावार....

बादलों के घुमड़ते काले कंगूरों से
झमाझम कूदते जल में
खिलाड़ी कौतुकी नक्षत्र वर्षा के,
राह भटके नाविकों के दिशा-सूचक मित्र
वे दिक्-काल के सबसे कुशल तैराक
पावस के सखा नक्षत्र
धान अरहर के उरद तिल बाजरे के
प्रिय सहोदर-
मघा, आर्द्रा, उत्तरा, पूर्वा, पुनर्वसु, पुष्य ....

घाघ की औ भड्डरी की
शस्य-श्यामल उक्तियों के वे महानायक,
वे बताते किसानों को-
अब समय आया
जुताई का, पराई का, बुवाई का, निराई का,
सिचाई का, कटाई का, मड़ाई का, ओसाई का....

शान्त और निःशब्द गंगा बाढ़ में इठला रही है
बिछ रही है नई उपजाऊ परत इक और
उगेगा इस पटल पर
फिर से नया संसार
महा कर पावस दमकते गगन में
जल में धरा में और धारा में
किसानों की गिरा में हो रहे मुखरित
छा गए सब ओर
पावस के सखा नक्षत्र-
मघा, आर्द्रा, उत्तरा, पूर्वा, पुनर्वसु, पुष्य

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