काल जकी वरदान ही
बणगी आज सराप |
करसो रैगो कळपतो
मन में दरद दबा'र |
भैंत जीवणों हाथ हो
लेगी भूख भगा'र |
ऊंळै मन सूं भी कदे
नी देखै तू आय |
म्हारो मरुधर बादळी
नीं आयो के दाय |
दूर उडावै मिनख नै
खुद सांभळ नै डोर |
करै सो मरजी रामजी
उण रो कीं नी जोर |
बूंद न बरसी बरस में
री उडीक अणमेत |
कैतो डरपी काळ सूं
कै म्हांसूं नीं हेत |
दोनूं कानी लाग री
बारैं भीतर आग |
लूंठी लू री लाय सूं
घणी पेट री दाझ |
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यह लम्बी कविता (दोहे) है, शेष शीघ्र ही पोस्ट कर दी जाएगी |
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