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12:55, 21 जुलाई 2010 {{KKGlobal}}
{{KKRachna
|रचनाकार=गोबिन्द प्रसाद
|संग्रह=मैं नहीं था लिखते समय / गोबिन्द प्रसाद
}}
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<poem>
हर उस चीज़ के बारे में
कुछ भी कहना ख़तरनाक है
जिसका कोई रंग नहीं होता
जैसे पानी:
पानी की ख़ामोशी
ख़ामोशी के भीतर,
अतल में ;अनल-सी पल-पल
धधकती,छटपटाती भाषा
और फिर
यह कहना भी इतना आसान कहाँ हैं
कि पुराना क़िला पुराना है
या क़िले के पत्थरों से लगा
मेखलाकार,यह ठहरा हुआ पानी
भाषा को देखूँ या पानी को सुनूँ
क्या पानी की उम्र तय नहीं हो सकती
स्वरों का आकाश शून्य में ही
अनहद की भाषा बोलता है
<poem>