Last modified on 5 अक्टूबर 2012, at 13:46

उमडि घुमडि घन छोरत अखंड धार / रामजी

Sharda suman (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 13:46, 5 अक्टूबर 2012 का अवतरण ('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=रामजी }} Category:पद <poeM> उमडि घुमडि घन छ...' के साथ नया पन्ना बनाया)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)

उमडि घुमडि घन छोरत अखंड धार
               चंचला उठति तामें तरजि तरजि कै.
बरही पपीहा भेक पिक खम टेरत हैं,
               धुनि सुनि प्रान उठे लरजि लरजि कै.
कहै कवि राम लखि चमक खदोतन की,
               पीतम को रही मैं तो बरजि बरजि कै.
लागे तन तावन बिना री मनभावन के,
               सावन दुवन आयो गरजि गरजि कै.