हक़ीक़त हक़ीक़त कहाँ मेरे बाद / 'महशर' इनायती

सशुल्क योगदानकर्ता २ (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 12:39, 18 अगस्त 2013 का अवतरण ('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार='महशर' इनायती }} {{KKCatGhazal}} <poem> हक़ीक़त ह...' के साथ नया पन्ना बनाया)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)

हक़ीक़त हक़ीक़त कहाँ मेरे बाद
के उभरेंगी परछाइयाँ मेरे बाद

तमाशाइयो चुन के रख लो इन्हें
तबर्रूक हैं ये धज्जियाँ मेरे बाद

मिसालों में ज़िक्र-ए-वफ़ा आएगा
चलेंगी मेरी दास्‍तां मेरे बाद

मुझे सौंप दो कुल ज़माने का ग़म
के मिट जाए ग़म का निशाँ मेरे बाद

मुअम्मा रही है मेरी ज़िंदगी
बढ़ेंगी ग़लत-फ़हमियाँ मेरे बाद

हिलाओ ना लब-हा-ए-शोला-फ़िशाँ
चले ना किसी पर ज़बाँ मेरे बाद

हरम भी वही बुत-कदा भी वही
मगर आप का आस्ताँ मेरे बाद

ग़नीमत है ‘महशर’ मेरी ज़िंदगी
के रोएगी उर्दू ज़बाँ मेरे बाद

इस पृष्ठ को बेहतर बनाने में मदद करें!

Keep track of this page and all changes to it.