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कहने रहथि मन्त्रीजी / चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’

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हुनका पुछलियनि,
कहल जाय अपने केँ
जे किछु मनोरथ छल
एखनहु धरि पुर भेल
आ की किछु बाँकी अछि?
बजला-
मनुक्खक तँ तृष्णा अनन्त छैक,
ककर पूर भेल छै जे हमरे सब
पूर होयत?
बात रहल सन्तोषक
सैह करऽ पड़ैत छैक।
तैयो आकांक्षा बस एक मात्र मनमे अछि।
इच्छा अछि-
मुइला पर मृत्युक समाचार
रेडिया वा टी. भी. पर की देतैक
सूनि लितहुँ
देखि लितहुँ बौआकेँ
हमरा मुइलाक बाद
कोन-कोन रूपेँ
के मदित की करैत छथिन
सान्त्वनाक बदलामे।
सोफा पर ओठङल सन,
चिन्तामे डूबल सन,
आँखि दुनू मुनने
ई कहने रहथि मन्त्री जी।