भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

और कितनी दूर जाना / शशि पाधा

Kavita Kosh से
Sharda suman (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 14:47, 29 नवम्बर 2014 का अवतरण ('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=शशि पाधा |अनुवादक= |संग्रह= }} {{KKCatKavita}} ...' के साथ नया पन्ना बनाया)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

हिन्दी शब्दों के अर्थ उपलब्ध हैं। शब्द पर डबल क्लिक करें। अन्य शब्दों पर कार्य जारी है।

उपलब्धियों की दौड़ में कब
खो गया सुख का ठिकाना
और कितनी दूर जाना?

क्या किसी पड़ाव पर
बैठ सेंकी धूप तूने
हाथ के दोने में रक्खी
बारिशों की बूँद तूने
भूल गया शोर में तू
पंछियों का चहचहाना
और कितनी दूर जाना?

उड़ रहा जो ठीक पीछे
धूल का गुब्बार देख
बाट जोहती, थक गई जो
आँख की बौछार देख
लौट आ , आबाद कर
हाथ जोड़े घर वीराना
और कितनी दूर जाना ?

फुनगियों पे नींव रखी
आसमां पे घर बसाया
एक दिन होगा अकेला
क्या कभी यह होश आया
भोगने का वक्त कम है
व्यर्थ ही भरता खजाना
और कितनी दूर जाना?