Last modified on 21 अप्रैल 2015, at 22:04

समर भूमि / सुरेन्द्र झा ‘सुमन’

Sharda suman (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 22:04, 21 अप्रैल 2015 का अवतरण ('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=सुरेन्द्र झा ‘सुमन’ |अनुवादक= |सं...' के साथ नया पृष्ठ बनाया)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)

नव उत्साह - सजल पावसकेर समर-भूमि ई साओन-भादव।
देखि विकट उत्ताप जगत भरि, विकल लोक आतपमे जरि-जरि
प्रखर ग्रीष्म-शासनसँ आसन डोलि उठल सुरपुर पुरुषक धरि!
तानि-मेघ-धनु विन्दु-बाण लय क्रुद्ध युद्धमे जुटल पवन-जव
नव उत्साह सजल पावर केर समर-भूमि ई साओन-भादव।।1।।

नील-नील घन-घटा जकर अछि ढाल, खंग, विद्युत करगत अछि!
ग्रीष्म अरिदलक छिन्न अगसँ रक्त-धार की वरसि रहल अछि?
नभसँ लय वसुधा धरि सगरो रणसागर उमड़ल ई अभिनव
नव उत्साह-सजल पावसकेर समर भूमि ई साओन-भादव।।2।।