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महानदी - 2 / मुकुटधर पांडेय

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कितना सुन्दर और मनोहर, महानदी यह तेरा रूप
कलकल मय निर्मल जलधारा; लहरों की है छटा अनूप
तुझे देखकर शैशव की है स्मृतियाँ उर में उठती जाग
लेता है कैशोर काल का, अंगड़ाई अल्हड़ अनुराग
सिकता मय अंचल में तेरे बाल सखाओं सहित समोद
मुक्तहास परिहास युक्त कलक्रीड़ा कौतुक विविध विनोद

नीर तीर वानीर निकट वह सैकत सौधों का निर्माण
विविध वर्ग विविधाकृतियों के शिलाखण्ड लघु चयन विधान
सायं प्रातः पुलिन प्रान्त में, किंशुक कानन बीच बिहार
तेरे गर्भ-देश में उत्थित, कुररी की वह करुण पुकार
बीते युग पर युग परिवर्तित हुआ आज मेरा संसार
पर तू वही, वही है तेरा यह निर्मल शीतल जलधार
नील गगन है वही और है वही बालुका का विस्तार
किसकी करुणा की वरुणा किस परमदेवता का वरदान
तेरे शाश्वत सुधा-स्रोत का बता कौन है उत्स महान
तेरी लहरों को गिनते जा सुनते तेरा कल संगीत
जाने कितनी ही सुख-दुःख की घड़ियाँ मेरी हुई व्यतीत
जीवन की सँध्या में अब तो है केवल इतना मन-काम
अपनी ममता मयी गोद में, दे मुझको अन्तिम विश्राम
चित्रोत्पले, बता तू मुझको वह दिन सचमुच कितना दूर
प्राण प्रतीक्षारत लूटेंगे, मृत्यु पर्व का सुख भरपूर