Last modified on 30 मई 2016, at 22:19

वसन्त विदाय / ऋतु रूप / चन्द्रप्रकाश जगप्रिय

Lalit Kumar (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 22:19, 30 मई 2016 का अवतरण ('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=चन्द्रप्रकाश जगप्रिय |अनुवादक= |स...' के साथ नया पृष्ठ बनाया)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)

दू महिना रही केॅ
आखिर लौटी गेलै वसन्त
खूब गमकलै अमराई
खूब गमकलै महुआ वन
केन्होॅ-केन्होॅ फूलोॅ के इत्र लगैनें
ऐलोॅ छेलै वसन्त
कि चारो दिश अभियो भी हवा मेॅ
कुछ-कुछ होनै छै खुशबू।

अभी होने मतैलोॅ छै
कदली वन
मतर कहिया तक?
लौटी गेलै वसन्त
फेनू सेॅ आवै के ढाढ़स देतेॅ
सबके रस-मनुहार लेतेॅ।