भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
मींहुं पियो जे परसाल जियां / एम. कमल
Kavita Kosh से
Lalit Kumar (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 00:43, 6 अक्टूबर 2016 का अवतरण ('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=एम. कमल |अनुवादक= |संग्रह=बाहि जा व...' के साथ नया पृष्ठ बनाया)
मींहुं पियो जे परसाल जियां-
सुॾिकन्दी छिति साॻ हाल जियां॥
जीवति जी थधि में ख़्वाबनि खे।
वेढ़े जीउ ऊनी शाल जियां॥
ज़िंदगीअ उमिरि जे कोके में।
टंगे छॾियो आ टुवाल जियां॥
सस्तो या कि महांगो, पर तूं।
विकामिजी वेंदें माल जियां॥
ॿुधु त दिलासा ताज़ा टोल।
चखि त आहिनि बांसी माल जियां॥
हिकु हिकु थी सभु अरमान कमल।
खोइजी विया गोल्फ़ बाल जियां॥