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जब से आपा किया समर्पित / कृष्ण मुरारी पहारिया

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जब से आपा किया समर्पित
चिंता मिटी, नींद भर सोया
कोई देखे, भले न देखे
मैंने क्या पाया, क्या खोया

अब ऐसा कुछ नहीं रह गया
जिसके पीछे पड़े झगड़ना
जब अधिकार नहीं कुछ फल पर
क्यों इससे उससे फिर लड़ना
जीवन जो संघर्ष बना था
तिरता है अब सहज नाव-सा
रोम-रोम में पुलकन दौड़ी
याद नहीं, था कहाँ घाव-सा

वे क्षण बस इतिहास रह गये
जब मैं कभी फूट कर रोया

माया के बंधन कटने पर
धरती माँ, आकाश पिता है
कोई बोध कान में कहता
वही सेज है , वही चिता है
भीतर एक जोत फूटी है
अंतर्यात्रा सुगम हो गयी
कोई किरण दृष्टी के पथ पर
शुभ सपनों की बेल बो गयी

अब हलका हलका लगता है
बोझा जो जीवन भर ढोया है