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घटि न थींदा / लक्ष्मण पुरूस्वानी

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थींदो घणोंई अफसोस जदहिं असां न हूंन्दासी
तुहिंजा ग़म बि घटि न थींदा

खिलन्दो रहीं जेकर त भलो
सूर त दिल जा न थींदा घटि

कहिडत्री जरुरत आ मुंह लिकाइण जी
लड़ी ईंदा लुड़िक बि अखियुनि मंझां

लॻन्दई गुल बि कन्डनि वांगुर
जदहिं वेझो तुहिंजे दीवानो न हूंदो

टुकुर दिल जा थींदा हजार ‘लक्षमण’
करे याद जदहिं बि थींदई उदासी