Last modified on 15 मार्च 2017, at 13:23

अतीत-बोध / योगेन्द्र दत्त शर्मा

Lalit Kumar (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 13:23, 15 मार्च 2017 का अवतरण ('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=योगेन्द्र दत्त शर्मा |अनुवादक= |स...' के साथ नया पृष्ठ बनाया)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)

बर्फ-सी ठंडी हुई है रेत
पर, खरगोश अब तक
तिलमिलाता है!

रुई-जैसे बाल झुलसे
जेठ की तपती दुपहरी
पांव के नीचे अलावों की
कई सतरें इकहरी

डबडबाई हुई आंखों में
वही बस दृश्य अक्सर
झिलमिलाता है!

थरथराती दूब पर, वे
ओस के हंसते हुए कण
पी गये दुर्दान्त मरु-पथ पर
बिताये अनमने क्षण

गुदगुदाती चांदनी में
धूप का अहसास अब भी
चिलचिलाता है!