भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

431 / हीर / वारिस शाह

Kavita Kosh से
Lalit Kumar (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 14:06, 5 अप्रैल 2017 का अवतरण ('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=वारिस शाह |अनुवादक= |संग्रह=हीर / व...' के साथ नया पृष्ठ बनाया)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

हीर चुप बैठी असीं कुट कढे साडा वाह पया नाल डोरयां<ref>मूर्ख लोग</ref> दे
उह वेलड़ा हथ ना आंवदा ए लोक दे रहे लख ढंडोरयां दे
इक रन्न गई दूज धन गया लोक मारदे नाल निहोरयां दे
धीयां राजयां दे नोहां डाढियां दियां कीकूं हथ आवन बिनां जोरयां दे
असीं खैर मंगया ओनां वैर कीता मैंनूं मारया दे नाल निहोरयां दे
वारस डाडयां दे सौ सत वीहां हाड़े रब्ब दे अगे कमजोरयां दे

शब्दार्थ
<references/>