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दुर्योधन / लोकगीता / लक्ष्मण सिंह चौहान

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तय करी बात दुवो घुमि घामि देखैय रामा।
कलाकारीगीरी माया सुर हो सांवलिया॥
गजब हैरान होबैय देखी देखी कारीगरी।
फीक लागैय गैय अपनो महल हो सांवलिया॥
बुझियो न परैय रामा जल कि जमीनमां हो।
जमीन जानी पैरबा बढ़ावैय हो सांवलिया॥
एक डेग बढैय उत छप देके गिरैय रामा।
भींजी गेलैन सुन्दर बसन हो सांवलिया॥
घोट टू घोट पानी यों कर कठ के भीतर गेलैय।
डुबकि सबकि उपरावैय हो सांवलिया॥